मजदूर दिवस. सिर्फ बधाई ही दोगे या इस मजदूर की भी कोई सुध लेगा? Jitendra kharwal.


चालीस से ज्यादा बसंत देख चुके जगमाल की दुनियां ने दस साल से खाट पर खूंटी तान रखी है। जिंदगी नरक से भी बदत्तर। इसी खटिया पर खाना-पीना और इसी पर दैनिक क्रिया। जमीन पर पांव रखे अरसा हो गया है। हिलना-डुलना भी हाथ नहीं, करवट बदलने के लिए भी परिवार का मोहताज।

दस साल से खाट पकड़े इस खुद्दार मजदूर के बदन पर जगह-जगह नासूर हो चुके हैं। घावों से पीप और आंखों से दर्द का दरिया बहता है। सरकार तो सुनती नहीं, मालिक ने भी मानो कानों में रुई ठूंस ली है। रह गया है तो सिर्फ जीने का मलाल। कौन सुने और किसको सुनाएं, बस जिंदगी है कि हर करवट के साथ एक नया घाव दे जाती है।

वो भी जमाना था जब पचपदरा के जगमालराम मेघवाल की गिनती मंजे हुए कारीगर-मिस्त्री के तौर पर होती थी। भरोसे के साथ टंच काम उसकी पहचान था। यही वजह थी कि लोग काम तो उसी से करवाने के लिए कई दिन कमठे को टाल दिया करते थे। सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। कमठे की कबीरी से जगमाल और उसका कुनबा मस्ती में दिन गुजार रहा था।

साल 2010 में पांवों तले की जमीन ऐसी फौरी आई कि इस परिवार पर दुःखों का पहाड़ सा टूट पड़ा। बालोतरा की एक कमठा साइट पर काम करते समय वह ऊंची छत से गिर गया और रीढ़ की हड्डी टूट गई। निर्माणकर्ता ने अस्पताल पहुंचाकर इलाज के बीस हजार दिए और खिसक गया। तब का दिन है और आज का दिन। रीढ़ जगमाल की नहीं, भरे-पूरे परिवार की टूट गई। छह सदस्यों के भारीघरे के एकमात्र कमाऊ ने भी खाट पकड़ ली। इधर इलाज का कमरतोड़ खर्च और उधर आमद पर ताला। ऐसे में चूल्हे की आंच मंद पड़नी ही थी। आखिरकार बड़े बेटे को पन्द्रह साल की उम्र में मजदूरी को महाराष्ट्र कूच करना पड़ा। कोरोना महामारी के लाॅकडाउन में वह जहां था, वहीं फंसकर रह गया। और इधर पचपदरा के मेगा हाइवे स्थित जगमाल की ढाणी में फाकाकशी की नौबत शुरू हो गई। उसके लिए सरकार तो अरसे से गूंगी-बहरी बनी हुई थी ही, वे दानदाता, जो जरूरतमंदों तक राशन पंहुचा रहे थे, उनमें से एक भी इस मजदूर की ढाणी तक दस्तक देने नहीं पंहुचा।

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पारदर्शिता के दावे करने वाले सिस्टम की भी विडम्बना देखिए कि पचपदरा के अच्छे-भले लोग सरकार की नजर में #गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली #(BPL) सूची में शुमार होकर मलाई जीम रहे हैं, लेकिन जगमाल जैसे मजलूम और मजबूर मजदूरों के लिए यहां कोई जगह नहीं है। आसपास की ढाणियों में बिजली-पानी के कनेक्शन है, लेकिन इस गरीब की कुटिया आज तक अछूती है। पेंशन के नाम पर मिलने वाली 750 रुप्पली से पांच जनों की पेटभराई और बीमार जगमाल का गुजरान हो रहा है। पेशे से कमठा कारीगर खीमराज सेजू(पीड़ित का भाई ) बताते हैं कि इन्द्रा आवास मंजूर हुआ था, उसमें भी बदकिस्मती ने पीछा नहीं छोड़ा और रकम किसी सक्षम चहेते के बैंक खाते में जमा हो गई। साढ़े तीन साल की मशक्कत के बाद टुकड़े-टुकड़े पैसे मिल पाए।

राष्ट्रीय मजदूर दिवस की सार्थकता और औचित्य तभी है, जब हर दिन तिल-तिल मरते जगमाल जैसे मजलूम मजदूरों को सम्बल दिया जाए। गरीब मजदूरों के कल्याण के लिए संचालित सरकारी योजनाओं में वास्तविक पात्र को जगह मिले। राजनीतिक हित साधने वाले चंद लोगों से प्राप्त सूची पर बंद आंखों से भरोसा करने की बजाय दानदाता भी अपने स्तर पर वेरिफिकेशन तथा ऐसे वास्तविक गरीबों की पहचान कर उनके दरवाजे पर दस्तक दें। वरना तय है कि अंधा बांटे रेवड़ी और फिर-फिर अपनो को देय।। इस मजदूर की वेदना को समझने और मदद का मरहम लगाने के लिए अगर किसी एक भी सक्षम ने देवदूत बनकर उसके दरवाजे पर दस्तक दे दी तो मैं समझूंगा मेरी कलम घिसाई बेकार नहीं गई। इसी के साथ आप सभी को मजदूर दिवस की अशेष शुभकामनाएं

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Jitendra kharwal

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